पंजाब में हिंदू वोट बना सत्ता की चाबी, AAP का ‘सनातनी’ दांव; BJP को बंगाल जैसे सियासी ध्रुवीकरण की उम्मीद

नई दिल्ली: आम आदमी पार्टी (AAP) ने पंजाब की राजनीति में हिंदू मतदाताओं को साधने के लिए एक बार फिर ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की राह पकड़ी है। पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने अमृतसर के ऐतिहासिक राम तीर्थ स्थल पर 150 करोड़ रुपये की लागत से लव-कुश मंदिर बनाने का ऐलान किया है। इसके साथ ही उन्होंने आम आदमी पार्टी को ‘सनातनी’ बताते हुए पंजाब की धार्मिक राजनीति में नया संदेश देने की कोशिश की है।

भक्ति कार्यक्रमों से मंदिरों तक, AAP का नया सियासी दांव

पंजाब सरकार जून से सरकारी स्तर पर कई भक्ति संध्याओं का आयोजन कर रही है। अब इन्हें प्रदेश के सभी 22 प्रमुख शहरों में आयोजित करने की योजना है। इसके अलावा पटियाला के काली माता मंदिर के लिए 80 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। सरकार हर साल करीब 1.5 लाख श्रद्धालुओं को मुफ्त तीर्थयात्रा कराने की योजना भी चला रही है।

मंदिरों को उनके प्रबंधन से जुड़े मामलों में ज्यादा अधिकार देने वाला नया कानून और एक दर्जन से अधिक जाति कल्याण बोर्डों का गठन भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। इन फैसलों के जरिए आम आदमी पार्टी शहरी और हिंदू मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश करती दिख रही है।

AAP के लिए सॉफ्ट हिंदुत्व कोई नई रणनीति नहीं

आम आदमी पार्टी की यह सॉफ्ट हिंदुत्व वाली राजनीति पहली बार सामने नहीं आई है। 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में मतदान से ठीक पहले अरविंद केजरीवाल ने टेलीविजन पर हनुमान चालीसा का पाठ किया था।

इसके बाद 2022 में गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनावों के दौरान उन्होंने भारतीय मुद्रा पर भगवान गणेश और देवी लक्ष्मी की तस्वीरें छापने की मांग उठाई थी। 2024 में राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम के दौरान दिल्ली की सभी 70 विधानसभा सीटों में सुंदरकांड और रामचरितमानस के पाठ का आयोजन भी कराया गया था।

भाजपा के बढ़ते प्रभाव के बीच AAP की रणनीति

हिंदू मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए भारतीय जनता पार्टी की पहचान लंबे समय से हिंदुत्व की राजनीति से जुड़ी रही है। ऐसे में जब भी भाजपा इस वर्ग में अपना प्रभाव बढ़ाती दिखाई देती है, आम आदमी पार्टी अपनी राजनीतिक रणनीति को सॉफ्ट हिंदुत्व की ओर मोड़ती रही है।

पंजाब में भी AAP की मौजूदा रणनीति को इसी नजरिए से देखा जा रहा है। पार्टी हिंदू मतदाताओं के बीच भाजपा की संभावित बढ़त को रोकने के साथ-साथ अपने शहरी जनाधार को मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

2024 में भाजपा का वोट शेयर बढ़ा, सीट फिर भी नहीं मिली

2024 के लोकसभा चुनाव में पंजाब में भाजपा का वोट शेयर बढ़कर 18.5 प्रतिशत हो गया था। 2019 के लोकसभा चुनाव में यह 9.63 प्रतिशत और 2022 के विधानसभा चुनाव में 6.6 प्रतिशत था। हालांकि वोट शेयर बढ़ने के बावजूद भाजपा राज्य में एक भी लोकसभा सीट जीतने में सफल नहीं रही।

विधानसभा की 117 सीटों में से भाजपा 24 सीटों पर बढ़त बनाने में कामयाब रही। इनमें करीब-करीब सभी सीटें शहरी इलाकों की थीं। पंजाब में हिंदू आबादी करीब 38.5 प्रतिशत है। संख्या के लिहाज से यह राज्य में अल्पसंख्यक समुदाय है, लेकिन इसकी भौगोलिक स्थिति और शहरी इलाकों में मौजूदगी इसे चुनावी राजनीति में बेहद महत्वपूर्ण बनाती है।

34 सीटों पर हिंदू सबसे बड़ा सामाजिक समूह

पंजाब की कुल आबादी का करीब 37.5 प्रतिशत हिस्सा शहरों में रहता है, जबकि राज्य के लगभग 59 प्रतिशत हिंदू मतदाता शहरों और कस्बों में रहते हैं। राज्य की 117 विधानसभा सीटों में से 34 सीटों पर हिंदू समुदाय सबसे बड़ा सामाजिक समूह है।

करीब 45 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां हिंदू आबादी या तो स्पष्ट बहुमत में है या चुनावी नतीजे को प्रभावित करने की स्थिति में है। यही वजह है कि कोई राजनीतिक दल ग्रामीण पंजाब में कमजोर प्रदर्शन के बावजूद शहरी और हिंदू बहुल सीटों के जरिए सत्ता में मजबूत स्थिति हासिल कर सकता है।

हिंदू मतदाता किसी एक दल के साथ नहीं रहे

पंजाब के शहरी हिंदू मतदाताओं ने अलग-अलग दौर में अलग-अलग राजनीतिक दलों का समर्थन किया है। 1970 और 1980 के दशक में उग्रवाद के दौर में शहरी व्यापारी और सरकारी कर्मचारी कांग्रेस के साथ मजबूती से खड़े रहे।

1997 में शिरोमणि अकाली दल और भाजपा के बीच गठबंधन बनने के बाद दोनों दलों के बीच स्पष्ट राजनीतिक बंटवारा देखने को मिला। अकाली दल ग्रामीण सिख मतदाताओं पर केंद्रित रहा, जबकि भाजपा ने शहरी हिंदू वोटों को अपनी राजनीतिक ताकत बनाया।

2020 में अकाली दल और भाजपा का गठबंधन टूट गया। इसके बाद ग्रामीण क्षेत्रों में भाजपा का प्रभाव कमजोर हुआ, जबकि अकाली दल को भी शहरी हिंदू मतदाताओं का वह समर्थन नहीं मिला, जो गठबंधन के दौरान उसके साथ जुड़ा था।

गठबंधन टूटने का फायदा AAP को मिला

अकाली दल और भाजपा के अलग होने का सीधा फायदा 2022 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को मिला। पार्टी ने माझा और मालवा दोनों क्षेत्रों के शहरी हिंदू मतदाताओं के बीच मजबूत प्रदर्शन किया।

पंजाब की चुनावी राजनीति में हिंदुओं को कई बार ‘साइलेंट वोटर’ के तौर पर देखा गया है। यह वर्ग आम तौर पर अपना राजनीतिक असंतोष मतदान के जरिए जाहिर करता है। पिछले तीन दशकों के चुनावी आंकड़ों के मुताबिक हिंदू वोटों में 7 से 14 प्रतिशत तक का बदलाव भी पंजाब की सत्ता का समीकरण बदलने की क्षमता रखता है।

2002 से 2007 के बीच कांग्रेस के हिंदू वोटों में 13.5 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई थी। इसके बाद पार्टी सत्ता से बाहर हो गई। इसी तरह 2012 से 2017 के दौरान अकाली-भाजपा गठबंधन के हिंदू वोटों में 10.5 प्रतिशत की कमी आई और गठबंधन की सीटें घटकर 18 रह गईं।

बंगाल मॉडल से AAP को क्यों बढ़ी चिंता?

पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भाजपा ने हिंदू मतदाताओं के बड़े पैमाने पर ध्रुवीकरण के जरिए अपना राजनीतिक आधार मजबूत किया है। हालांकि पंजाब में अब तक यह मॉडल उसी तरह प्रभावी नहीं रहा है।

पंजाब का हिंदू समुदाय किसी एक प्रभावशाली जाति या वर्ग तक सीमित नहीं है। इसमें व्यापारी, उद्योगपति, पेशेवर और अलग-अलग जातीय समूह शामिल हैं। लंबे समय से राज्य की नीतियों और वित्तीय आवंटन का बड़ा जोर कृषि क्षेत्र पर रहा है। इसके कारण शहरी व्यापारी और उद्योगपति वर्ग के बीच उपेक्षा की भावना बनी है।

ऐसे राजनीतिक और सामाजिक समीकरणों के बीच आम आदमी पार्टी का नया ‘सनातनी’ रुख केवल धार्मिक संदेश तक सीमित नहीं माना जा रहा। इसे भाजपा के बढ़ते वोट आधार में सेंध लगाने, शहरी हिंदू मतदाताओं को अपने साथ बनाए रखने और पंजाब की सत्ता के लिए जरूरी चुनावी समीकरण साधने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।

 

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